ओ३म्
पावन गायत्री कथा
जिज्ञासा
ये पावन गायत्री कथा का क्या मतलब है?
समाधान
पावन का अर्थ है पवित्र। जिस तरह परमात्मा पवित्र है उसी तरह संसार की समस्त आत्माएं स्वभाव से पवित्र ही हैं, परंतु अविद्या (अज्ञान, मिथ्याज्ञान) के कारण बंधन में हैं। यदि वैदिक विधि से गायत्री का जप व ध्यान किया जाए तो आत्मा अपने पवित्र स्वरूप में आकर पावन हो जायेगी।
रही बात “कथा” — कथा उपदेश की एक ऐसी शैली है कि सामान्य से सामान्य श्रोता को भी शास्त्रों की गूढ़ बातें सहजता से समझ में आ जाती हैं।
जिज्ञासा
बाराबंकी से बहन रंजना अवस्थी ने पूछा है: लोग कहते हैं कि स्त्रियों को गायत्री मंत्र नहीं जपना चाहिए और जनेऊ नहीं पहनना चाहिए! क्या ये सही है?
समाधान
यही तो विडंबना है — हिंदू कहते हैं, पर शास्त्र पढ़ते नहीं। ये तथाकथित कथावाचक बड़े-बड़े मंचों से कहते हैं कि महिलाओं को गायत्री मंत्र नहीं पढ़ना चाहिए, यज्ञोपवीत नहीं पहनना चाहिए। हमारी भोली-भाली बहनें ‘सत्यवचन महाराज’ कहकर मान लेती हैं।
लेकिन सत्य छिपाने से छिपता नहीं है। आज कन्या गुरुकुल (वाराणसी, चोटीपुरा, हाथरस, नजीबाबाद), पतंजलि गुरुकुलम (हरिद्वार), गायत्री परिवार शांतिकुंज जैसे संस्थानों के माध्यम से देश-विदेश में करोड़ों महिलाएं गायत्री मंत्र बोलती हैं, जनेऊ पहनती हैं और वेद पढ़ती व पढ़ाती हैं।
इतनी जागरूकता के बाद भी यदि महिलाएं इन पेशेवर, स्वार्थी, शास्त्र-अज्ञानी कथावाचकों की बात मानती हैं, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
अब मैं आपको सनातन धर्म के प्रमाणिक शास्त्रों व ऐतिहासिक घटनाओं के माध्यम से सिद्ध कर रहा हूँ कि बहनों को गायत्री मंत्र पढ़ना चाहिए, जनेऊ पहनना चाहिए, वेद पढ़ना चाहिए।
प्रमाण एक
गोभिल गृह्यसूत्र २-१-१९-३१
“प्रावृत्ता यज्ञोपवीतिनीम अभ्युदानयन्। जपेत सोमोऽददत गन्धवार्य इति।”
अर्थ: कन्या को वस्त्र व यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण कर विवाह मंडप में लाएं और “सोमोऽददत्” मंत्र पढ़ें।
प्रमाण दो
हारीत संहिता
“पुराकल्पे हि नारीणां मौञ्जीबंधनं मिष्यते। अध्यापनं च वेदानां सावित्री वाचनं तथा।”
यह श्लोक नारी के दो भेद बताता है:
- ब्रह्मवादिनी – वेदाध्ययन, अग्निहोत्र करती है।
- सद्योवधू – शीघ्र विवाह योग्य कन्या जिसका उपनयन विवाह से पहले कर देना चाहिए।
प्रमाण तीन
यजुर्वेद
नारी को “स्तोमपृष्ठा” कहा गया है, जिसका अर्थ है वह वेदों पर प्रश्न कर सकती है।
श्रौत ग्रंथों में लिखा है:
“इमं मंत्रं पत्नी पठेत्” — इस मंत्र को केवल स्त्री ही पढ़े, पुरुष नहीं।
प्रमाण चार
कादंबरी (बाणभट्ट, हर्षवर्धन काल)
महाश्वेता जनेऊ पहनती थी। चंद्रपीड़ ने कहा:
“ब्रह्मसूत्रेण पवित्री कृतकायाम्” — ब्रह्मसूत्र (जनेऊ) के कारण उसका शरीर पवित्र हो रहा था।
प्रमाण पांच
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड ४९/१४
“संध्याकाल मनःश्यामा ध्रुवमेष्यति जानकी। नदी चेमा शुभजलां संध्यार्थे वरवर्णिनी।।”
हनुमान जी कहते हैं: अवश्य ही जानकी संध्या के लिए नदी किनारे आएंगी, गायत्री मंत्र का जप करते हुए।
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड ५३/२५
“वैदेही शोक संतप्ता हुताशनमुपागत।“
माता सीता दुःख में हवन करने बैठ जाती हैं।
प्रमाण छह
अथर्ववेद
“ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्।”
अर्थ: कन्या पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन कर, गायत्री व वेद पढ़कर विद्वान पति को प्राप्त करे।
आभार
बहन रंजना अवस्थी (दशहराबाग) का आभार कि उन्होंने समय पर यह प्रश्न किया। जब तक नारी वेद नहीं पढ़ेगी, गायत्री नहीं जपेगी, यज्ञोपवीत, यज्ञ, योग, संध्या नहीं करेगी — तब तक कथावाचक उसका शोषण करते रहेंगे और समाज में उपेक्षित रहेगी।
उठो, जागो
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जिज्ञासा
पावन गायत्री कथा का जो आध्यात्मिक शिविर एक माह तक चलेगा उसमें किस तरह से प्रशिक्षण मिलेगा?
समाधान
- प्रतिदिन शिविरार्थी को गायत्री मंत्र का शुद्ध उच्चारण कराया जायेगा।
- प्रत्येक पद का अर्थ बताया जायेगा।
- मंत्र का भावार्थ समझाया जायेगा।
- बताया जायेगा कि गायत्री मूर्ति नहीं, वेद का मंत्र है।
- मंत्र के २४ अक्षरों पर व्याख्यान होगा।
- गायत्री मंत्र से जुड़ी भ्रांतियों को दूर किया जायेगा।
- बालक/बालिकाओं के शारीरिक, आत्मिक, सामाजिक विकास पर चर्चा होगी।
- प्रतिदिन 5 मिनट ध्यान की विधि बताई जायेगी।
- वैदिक भजन व गूढ़ रहस्यों पर एक घंटा उपदेश होगा।
- अंतिम दिन परीक्षा व पुरस्कार वितरण के साथ शिविर का समापन होगा।
विशेष सूचना
- सभी शिविरार्थियों को डायरी व पेन लाना अनिवार्य है — प्रतिदिन एक प्रश्न लिखा जायेगा, अंतिम दिन 30 प्रश्नों की परीक्षा होगी।
- प्रतिदिन 5 मिनट शंका समाधान कार्यक्रम चलेगा।
व्यवस्थापिका
पंडिता रुक्मिणी शास्त्री
मोबाइल: 9918436237
विनम्र निवेदन
आचार्य सुरेश वैदिक प्रवक्ता
आर्यावर्त साधना सदन, दशहरा बाग, बाराबंकी, उत्तर प्रदेश।
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