🌺 हुतात्मा श्री परमानन्द जी का बलिदान 🌺
“अगर है वेदों से कुछ मुहब्बत, करो जहाँ तक भी हो हिफाजत।
पियो खुशी से मये शहादत, तुम अपनी गर्दन कटा कटा कर।।”
आर्य समाज के इतिहास में अनेक ऐसे वीर जन्में जिन्होंने वेदधर्म की रक्षा हेतु अपने प्राणों की आहुति दी। उन्हीं में एक पावन नाम है – श्री परमानन्द जी का, जिन्होंने सच्चाई और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए प्राणों की बलि दे दी।
1.जन्म व बाल्यकाल–
श्री परमानन्द जी का जन्म ७ अप्रैल १९२० ई. को डेरा गाज़ी खां (अब पाकिस्तान में स्थित) के एक साधारण दुकानदार के घर हुआ। आपके परिवार में दो भाई और दो बहनें थीं। दस वर्ष की अवस्था में वे गुरुकुल वट सोहनी में अध्ययन हेतु प्रविष्ट हुए और पंद्रह वर्ष की आयु में लाहौर पहुँचकर श्री प्यारे लाल जी के साथ काम करने लगे।
2.जिल्दबन्दी से जीवन यज्ञ तक–
लाहौर में वे पुस्तकों की जिल्दबन्दी का कार्य करने लगे। उर्दू सत्यार्थ प्रकाश के प्रकाशन हेतु प्रादेशिक सभा का संपर्क उनकी दुकान से हुआ। कुछ मुस्लिम कारीगरों ने, जो उसी दुकान पर कार्य करते थे, यह कार्य घर पर ले जाकर करने की अनुमति माँगी। प्यारे लाल जी ने उनकी बात मान ली।
परंतु २५ मई १९४४ को जब कार्य का सामान लौटाया गया, तब इन कारीगरों ने धार्मिक द्वेषवश उस साहित्य को जलाने का प्रयास किया। जब श्री परमानन्द जी ने उन्हें रोकना चाहा, तो उन पर चाकू से क्रूर हमला कर दिया गया। वे गंभीर रूप से घायल हुए और २६ मई १९४४ को प्रातः ६ बजे उन्होंने वीरगति प्राप्त की।
3.न्याय का अभाव–
यह दुःखद है कि इस निर्मम हत्या के बावजूद किसी अपराधी को दण्ड नहीं दिया गया। यह उस काल की धार्मिक असहिष्णुता और न्यायिक दुर्बलता का दर्पण है।
🙏 श्रद्धांजलि 🙏
श्री परमानन्द जी का यह बलिदान वैदिक धर्म, सच्चाई और साहित्यिक स्वतंत्रता के लिए था। वे हम सभी आर्यजनों के लिए प्रेरणा-स्तम्भ हैं। उनका त्याग हमें यह सिखाता है कि—
“धर्म की रक्षा हेतु, प्राण देना भी पवित्र यज्ञ है।”










