हुतात्मा सुनहरा जी

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शहीद सत्याग्रही सुनहरा जी – एक स्वर्णिम बलिदान ✨

सुनहरा केवल अपने परिवार का ही नहीं, बल्कि समूचे गाँव बुटाना (जि. रोहतक) का गौरव था। वे हंसमुख, स्वस्थ, सुन्दर और बलिष्ठ युवक थे। मल्ल युद्ध के शौकीन और जाट कुल के तेजस्वी पुत्र थे। श्री जगराम जी के घर जन्मे इस वीर बालक की माता का देहान्त बचपन में ही हो गया था। पिता ने अपने एकमात्र पुत्र को अत्यंत स्नेह से पाला-पोसा। पाठशाला में नियमित शिक्षा नहीं पा सके, किंतु घर पर ही हिन्दी भाषा में दक्षता प्राप्त की।

🚩 सत्याग्रह में भागीदारी

जिस समय भारतवर्ष में सत्याग्रह आन्दोलन प्रारम्भ हुआ, उस समय सुनहरा जी के विवाह (गौने) की तिथि निश्चित हो चुकी थी। किंतु देश सेवा का भाव इतना प्रबल था कि वे विवाह को स्थगित कर सत्याग्रही जत्थे में भर्ती होकर हैदराबाद रवाना हो गये। परिवार और रिश्तेदारों ने रोकने का बहुत प्रयास किया, परंतु उन्होंने किसी की न सुनी। उनका स्वभाव दृढ़ निश्चयी था – जो ठान लिया, उसे पूरा करके ही दम लेते थे।

🛑 औरंगाबाद सत्याग्रह व गिरफ्तारी

५ जून को श्री महाशय कृष्ण जी के साथ उन्होंने औरंगाबाद (हैदराबाद राज्य) में सत्याग्रह किया और गिरफ़्तार कर लिये गये। इतने अधिक सत्याग्रही एक साथ जेल पहुँचे कि जेल प्रशासन अव्यवस्थित हो गया। ७०० सत्याग्रहियों को उचित भोजन और व्यवस्था नहीं मिल पाई। बताया गया कि ३० घंटे तक उन्हें केवल आधी रोटी दी गई।

🔥 जेल में अत्याचार और शहादत

भूख, असंतोष और अभाव के बीच असन्तोष की आवाज़ उठी, तो पुलिस ने लाठियों से बर्बरतापूर्वक हमला किया। सुनहरा जी भी इसमें घायल हुए। ज्वर ने विकराल रूप लिया, शरीर में फोड़ा हो गया, ज्वर १०५ डिग्री तक पहुँच गया। ८ जून की सुबह ७ बजे उस सुनहरे जीवन का सूर्य अस्त हो गया। कहा जाता है कि उनके शरीर पर चोटों के निशान थे, जिससे उनकी मृत्यु को संदेहास्पद बताया गया।

🕯 अन्तिम संस्कार और जन सम्मान

जब औरंगाबाद नगर में उनकी मृत्यु की सूचना फैली, तो नगर के प्रतिष्ठित नागरिक एकत्र हुए। प्रशासन शव को शहर में घुमाने की अनुमति नहीं दे रहा था, अन्त में सहमति बनी कि सत्याग्रही शव को प्रशासन द्वारा निर्धारित मार्ग से श्मशान भूमि ले जाएं। वहां सहस्रों लोग अन्तिम दर्शन को उपस्थित हुए। शव को वैदिक विधि से अग्नि को समर्पित किया गया।

सत्याग्रही अपने वीर साथी की शहादत पर गर्व और ईर्ष्या की मिश्रित भावना लिए जेल को लौटे, जहां उनका उद्देश्य अब और अधिक दृढ़ हो चुका था।


येषां नो मङ्गले इच्छन्ति मित्रमाहुः सुहृदं च ते।
ते नो रक्षन्तु ये च स्तो वीराः स्वर्गं गताः।।

वे वीर जो अपने देश और धर्म की रक्षा हेतु प्राणों की आहुति देते हैं, वे अमर होते हैं।

🔚 श्रद्धांजलि

वीर शहीद सुनहरा जी का बलिदान भारतवर्ष के उस स्वर्णिम इतिहास का भाग है, जहाँ राष्ट्रभक्ति व्यक्तिगत सुख-सुविधा पर भारी रही। उनका नाम सदैव सत्य, साहस और सेवा का प्रतीक बना रहेगा।

🕊 “वो सुनहरा आज़ादी का सूर्य – जो अपनी आहुति दे गया, लेकिन देश को नया उजाला दे गया।”