दो दिन की कहानी है
तर्ज – बचपन की मौहब्बत को…….
दो दिन की कहानी है,
तू जान नहीं पाया।
मिट्टी में मिलेगी ये,
अनमोल तेरी काया।।
सब छोड़के ग़म खुशियाँ,
संसार से जायेगा क्या पता
जन्म कितने, इस जग में पायेगा
अब सोच “सचिन” कुछ तू,
जग में क्यूँ भरमाया दो दिन की……
सोना चाँदी हीरे,
ना साथ निभायेंगे
ये महल और बंगले,
तेरे साथ ना जायेंगे देगी
ना साथ तेरा,
घर में ये भरी माया दो
दिन की……
जो उम्र बची तेरी,
एक दिन होगी
पूरी रंगीन ज़माने से,
जाना भी है मजबूरी
ओझल हो जायेगा,
दुनियाँ से तेरा साया दो
दिन की……
जो मीत तेरे बनते,
वो ही चिता जलायेंगे
कोमल से तन में वो,
तेरे आग लगायेंगे ना
ख़बर तुझे होगी,
है धूप या है छाया दो
दिन की……










