वाणी तुझे सजाऊँ, मधुमय तुझे बनाऊँ
मेरे मन के चिन्तनों से अमृत तुझे पिलाऊँ
कितने जतन से मिलती अनमोल मेधा बुद्धि
वाणी से होके प्रेरित बने प्रेमरूप शक्ति
तुझको परमपिता की पहचान मैं कराऊँ ॥ वाणी तुझे सजाऊँ..
दे सान्त्वना तू दुःख में, ना गर्व करना सुख में
सबके दिलों में बहना ठंडी हवा के रुख में
सत्कर्म से मैं तुझको सत्य मार्ग पे ले जाऊँ ॥ वाणी तुझे सजाऊँ…
वेदों से तू धनी हो और ज्ञान से गुणी हो
निर्मल पवित्र बनकर प्रभु छाँव में पली हो
आ वेद ज्ञान देकर वसुवित तुझे बनाऊँ ॥ वाणी तुझे सजाऊँ…
देना अगर कसौटी कभी न उतरना खोटी
बनाना ओजस्विनी तू, मंगलमयी अनूठी
तुझको अनन्त प्रभु से आशीश में दिलाऊँ ॥ वाणी तुझे सजाऊँ…
प्रभु तुम दया के सागर दो प्रेमरूप मोती
वाणी में तुम जगाओ प्रभु सत्यरूप ज्योति
अन्तर स्वरों से साजे वही प्रेम गीत गाऊँ ॥ वाणी तुझे सजाऊँ…
(मधुमय) मिठास से भरा (अन्तर स्वर) हृदय से निकले हुए आतुर स्वर (वसुवित) बसानेवाला
(सान्त्वना) आश्वासन (ओजस्विनी) कांति स्वरूप, प्रतापी, प्रभावशाली (मेधाबुद्धि) प्रकाशित बुद्धि
(इस भजन में आत्मा वाणी से कहती है)
तर्ज: गा गीत तू असावे










