मनवा मनवा गया हीरा जन्म क्यूँ छोड़ के
क्या मिला तुझको कौड़ियाँ जोड़ के !!
समझ ना आई तुझे इस संसार की
कदर ना जानी परमात्मा के प्यार की
हुआ पाप में बदनाम….मनवा
तुझे क्यूँ सताया काम क्रोध लोभ मोह ने
अन्त जो आया तो तपाया कष्ट रोग ने
चैन मिला ना आराम….मनवा
जिया के लिए तू जीया रंगरलियों में
जाने अनजाने तू उलझा कई पहेलियों में
जान के बना तू अन्जान…मनवा
प्रेरणा मिली ना तुझे कभी सत्संग की
व्यर्थ बनाई आदत तूने बुरे संग की
वक्त पे आया ना कोई काम….मनवा
जीवन की नाव दी कर्म पतवार दी
आनन्द हेतु प्रभुने ज़िन्दगी उधार दी
माया मिली ना ही राम….मनवा
राख में गया तू साथ में गई जिन्दगानी
जग ने ना पाई तेरी अमर कहानी
कट गया खाते से नाम….मनवा
तर्ज: जोगिया जोगिया कहाँ जाने लगा है










