नासदीय सूक्त (ऋग्वेद )

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ऋग्वेद का 10वाँ मंडल का 129वाँ सूक्त

तब शून्यता भी नहीं थी, अस्तित्व भी नहीं था, तब न तो हवा थी, न ही उसके पार आकाश। उसे किसने ढक रखा था? वह कहाँ था? किसके संरक्षण में था तब क्या वहाँ अथाह गहराई में ब्रह्मांडीय जल था?
तब न तो मृत्यु थी, न अमरता थी, न ही रात और दिन की मशाल थी। वह एक था जो बिना हवा के और खुद को संभाले हुए सांस लेता था। तब वह एक था, और कोई दूसरा नहीं था।
पहले तो अंधकार ही अंधकार था।यह सब केवल अप्रकाशित जल था।
वह जो अस्तित्व में आया, शून्य में घिरा हुआ,अंत में ऊष्मा की शक्ति से उत्पन्न हुआ।
आरम्भ में इच्छा उसमें उतरी - वह मन से उत्पन्न मूल बीज था। जिन ऋषियों ने बुद्धि से अपने हृदय की खोज की है, वे जानते हैं कि जो है वह उससे संबंधित है जो नहीं है।
और उन्होंने शून्य के आर-पार अपनी डोरी फैला दी है,और जानते हैं कि ऊपर क्या था, और नीचे क्या था।
मौलिक शक्तियों ने उपजाऊ शक्तिशाली ताकतें बनाईं।नीचे ताकत थी, और उसके ऊपर आवेग था।
किन, आख़िरकार, कौन जानता है, और कौन कह सकता हैयह सब कहाँ से आया, और सृष्टि कैसे हुई?
देवता स्वयं सृष्टि से बाद में हैं,तो कौन जानता है कि यह वास्तव में कहाँ से उत्पन्न हुआ है?
सारी सृष्टि की उत्पत्ति कहाँ से हुई,उसने, चाहे उसने इसे बनाया हो या नहीं,
वह, जो सर्वोच्च स्वर्ग से इसका निरीक्षण करता है,वह जानता है - या शायद वह भी नहीं जानता।

NOTE-नासदीय सूक्त ऋग्वेद का एक प्रमुख सूक्त है इस सूक्त में ब्रम्हांड के कई रहस्य है इसकी व्याख्या के लिए आप ऋग्वेद भाष्य पढ़े |