ओ३म् द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,
पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति: ।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि ॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥1॥
———पद्य अनुवाद———
शान्ति: कीजिये, प्रभु त्रिभुवन में,
जल में, थल में और गगन में,
अन्तरिक्ष में, अग्नि पवन में,
औषधि, वनस्पति, वन, उपवन में,
सकल विश्व में जड़-चेतन में|
शान्ति राष्ट्र-निर्माण सृजन,
नगर, ग्राम और भवन में
जीवमात्र के हो तन-मन में,
और जगत के हो कण कण में,
शान्ति: कीजिये, प्रभु त्रिभुवन में|










