व्यक्तित्व विकास के शील गुण

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व्यक्तित्व से अभिप्राय उन शीलगुणों से है जो जन्मजात होते हैं और इन्हें इस जन्म में भी प्राप्त किया जा सकता है। सामान्य रूप में सुन्दर कदकाठी, अच्छे वस्त्र और बातचीत करने का ढंग सबको अपनी ओर आकर्षित करते हैं परन्तु व्यक्तित्व केवल इतना ही नहीं है। उसमें कुछ मौलिक विशेषतायें होती हैं।

पाण्डवों के राजसूय यज्ञ से लौटकर दुर्योधन को उनके वैभव से ईर्ष्या होने लगी। वह चिन्तित रहने लगा और कई दिन सभा भवन में भी नहीं गया। धृतराष्ट्र ने उसे बुलाकर चिन्ता का कारण पूछा तो उसने कहा कि पाण्डवों के यहाँ दस हजार विद्वान् ब्राह्मण प्रतिदिन सोने की थालियों में भोजन करते थे। कोषागार का अध्यक्ष मुझे बनाया गया। मैंने अधिक से अधिक धन लुटाने का प्रयत्न किया परन्तु उनका खजाना रिक्त होने के स्थान पर धन-धान्य से और भी अधिक बढ़ गया। पिताश्री ! यही चिन्ता मुझे विचलित कर रही है।

धृतराष्ट्र ने कहा पुत्र! तुम शील को धारण कर युधिष्ठिर से भी अधिक वैभव को प्राप्त कर सकते हो। जहाँ शील है वहीं धर्म का निवास रहता है। जहाँ सत्य है वहाँ धर्म स्थित रहता है। इसी भाँति सदाचार का आश्रय सत्य है और सदाचारी में ही बल तथा बलवान् व्यक्ति के पास ही लक्ष्मी रहती है। इसमें कोई संशय नहीं।

धर्मः सत्यं तथा वृत्तं बलं चैव तथाप्यहम्। शीलमूला महाप्राज्ञ सदा नास्त्यत्र संशयः ।।

महा. शा. 124/62

दुर्योधन ने पूछा पिता जी इस शील की प्राप्ति का क्या उपाय है। पुत्र के प्रश्न का उत्तर देते हुये महाराज धृतराष्ट्र कहने लगे-

अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत् प्रशस्यते ।।66।।

मन, वचन, कर्म से किसी भी प्राणी से द्रोह न करना, सब पर दया करना और यथाशक्ति दान करना, यह शील कहलाता है, जिसकी सब लोग प्रशंसा करते हैं।

यदन्येषां हितं न स्यादात्मनः कर्म पौरुषम्। अपत्रपेत वा येन न तत् कुर्यात् कथर्सञ्चन ।। 67।।

जिस कार्य में दूसरों का हित न होता हो अथवा जिसे करने में संकोच होता हो, उसे कदापि नहीं करना चाहिये।

तत्तु कर्म सदा कुर्याद् येन श्लाघ्येत संसदि। शीलं समासेनैतत् ते कथितं कुरुसत्तम ।। 68।।

वही कर्म किया जाये जिसकी सभा या समाज में लोग प्रशंसा करें। लोक विरुद्ध कर्म त्याज्य है।

उपरोक्त पञ्चशील गुण ऐसे हैं जिन्हें धारण कर कोई भी व्यक्ति समाज में सम्मान प्राप्त कर सकता है। इसके अतिरिक्त सभ्यता शिष्टाचार का अभ्यास माता-पिता और गुरुजनों द्वारा बालकों को घर एवं विद्यालय में कराना चाहिये। बिना सुशिक्षा, शिष्टाचार और सभ्यता के व्यक्ति सभा एवं समाज में उसी प्रकार शोभित नहीं होता जैसे हंसों के मध्य बगुला।

व्यक्तित्व में कुछ गुण तो जन्मजात होते हैं जिन्हें हम शीलगुण भी कह सकते हैं। कुछ गुणों का प्रयत्न द्वारा विकास किया जाता है। सामान्यतः व्यक्ति के वे गुण जो दूसरों को प्रभावित करें उन्हें व्यक्तित्व वाले गुण कहा जाता है। अंग्रेजी भाषा में इसे Personality कहते हैं जिसकी व्युत्पत्ति लेटिन शब्द Persona से हुई है। इसका अर्थ मुखौटा होता है। जैसे किसी नाटक या रामलीलाओं में पात्र वानर, राक्षस, रावण अथवा विभिन्न पशुओं का अभिनय करने के लिये मुख पर मुखौटा लगाकर जनता को प्रभावित करते हैं वैसे ही अपने व्यवहार, बातचीत, वेशभूषा, रंगरूप आदि गुणों से दूसरों को जितना अधिक प्रभावित किया जा सके उसका व्यक्तित्व उतना ही अच्छा माना जाता है।

व्यक्तित्व के विकास में शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आध्यात्मिक आदि सभी का समावेश होता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से व्यक्तित्व का सम्बन्ध वंशानुक्रम तथा वातावरण दोनों से है। व्यक्तित्व को हम किसी व्यक्ति के चरित्र से अलग नहीं कर सकते। इसीलिये हमारे यहाँ चरित्र का बहुत महत्व रहा है।

साभार -स्वामी देवव्रत सरस्वती जी