1️⃣ प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा
📅 जन्म: 11 सितंबर 1908
📍 जन्म स्थान: रोहितभोग, मुंशीगंज जिला, (वर्तमान बांग्लादेश)
👨👩👦 पिता: इंजीनियर रेबतीमोहन बसु
🏫 शिक्षा: मैट्रिक के बाद मेडिकल की पढ़ाई के लिए मिट्फोल्ड मेडिकल कॉलेज में दाखिला
🔹 मेडिकल की पढ़ाई पूरी नहीं कर सके क्योंकि वे क्रांतिकारी हेमचंद्र घोष के संपर्क में आकर युगांतर पार्टी से जुड़ गए।
2️⃣ क्रांतिकारी गतिविधियों की शुरुआत
🔹 1928 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा बनाए गए बंगाल वॉलंटियर समूह में शामिल हुए।
🔹 इस समूह ने जल्द ही खुद को सक्रिय क्रांतिकारी संगठन में बदल लिया।
🔹 संगठन का मुख्य लक्ष्य था ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों का सफाया करना।
3️⃣ पुलिस अधिकारी लोमैन की हत्या (1930)
🎯 लक्ष्य: ब्रिटिश पुलिस अधिकारी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस लोमैन
🏥 स्थान: मेडिकल स्कूल हॉस्पिटल
🔫 हमला:
✅ बेनोय बसु ने लोमैन को गोली मारकर मौके पर ही मौत के घाट उतार दिया।
✅ पुलिस अधीक्षक हडसन गंभीर रूप से घायल हुआ।
📸 इसके बाद ब्रिटिश पुलिस ने बेनोय की तस्वीर पूरे बंगाल में चिपका दी, लेकिन वे कई बार पुलिस के हाथों आते-आते बच गए।
4️⃣ रोमांचक बचाव अभियान
🔹 बेनोय बसु ने कई रूप धारण कर पुलिस को चकमा दिया –
🧕 मुस्लिम भिखारी
👨💼 जमींदार
🔹 ब्रिटिश पुलिस लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें पकड़ नहीं पाई।
5️⃣ राइटर्स बिल्डिंग हमला (8 दिसंबर 1930)
🏛 स्थान: डलहौजी स्क्वायर (वर्तमान बी.बी.डी. बाग), कलकत्ता
🎯 लक्ष्य: इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ प्रिजन एन.एस. सिम्पसन
🛡 साथी क्रांतिकारी:
✅ बेनोय कृष्ण बसु
✅ दिनेश गुप्ता
✅ बादल गुप्ता
🔫 हमले के मुख्य बिंदु:
✅ तीनों क्रांतिकारियों ने यूरोपियन लिबास में राइटर्स बिल्डिंग में प्रवेश किया।
✅ सिम्पसन को मौके पर ही मार गिराया।
✅ ब्रिटिश पुलिस से लंबी मुठभेड़ हुई जिसमें कई अधिकारी घायल हुए।
6️⃣ अंतिम बलिदान
🚨 आखिरी लड़ाई:
➡️ जब ब्रिटिश पुलिस हावी होने लगी, तो तीनों क्रांतिकारियों ने गिरफ्तार न होने का फैसला किया।
☠️ बादल गुप्ता – पोटेशियम सायनाइड खा लिया।
🔫 बेनोय बसु और दिनेश गुप्ता – अपनी ही रिवॉल्वर से खुद को गोली मार ली।
🏥 अस्पताल में बेनोय बसु की 13 दिसंबर 1930 को शहादत हो गई।
⚖️ दिनेश गुप्ता को फांसी की सजा हुई और 7 जुलाई 1931 को अलीपुर जेल में उन्हें फांसी दे दी गई।
7️⃣ शहादत की अमर गाथा
🎖 क्रांति पर प्रभाव:
✅ इन तीनों की शहादत ने भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को और मजबूत कर दिया।
✅ देशभर में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ क्रोध और विरोध की लहर दौड़ गई।
🏛 सम्मान एवं स्मृति:
📍 डलहौजी स्क्वायर का नाम बदलकर “बी.बी.डी. बाग” रखा गया।
📜 बेनोय-बादल-दिनेश की गाथा आज भी इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
8️⃣ निष्कर्ष
🔥 बेनोय कृष्ण बसु एक अमर बलिदानी थे, जिन्होंने मातृभूमि की आज़ादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।
🇮🇳 हम सभी को उनकी शहादत से प्रेरणा लेकर देशभक्ति की भावना को जीवित रखना चाहिए।
💫विस्तृत जीवन परिचय 💫
कल भारतमाता को दासता की बेड़ियों से मुक्त कराने के संघर्ष में अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर बलिदानी बेनोय कृष्ण बसु का जन्मदिवस है| उनका जन्म वर्तमान बंगलादेश के मुंशीगंज जिले के रोहितभोग में इंजीनियर रेबतीमोहन बसु के घर 11 सितम्बर 1908 में हुआ था| मैट्रिक की पढाई के बाद उन्होंने मेडिकल के पढाई के लिए मिट्फोल्ड मेडिकल कालेज में दाखिला ले लिया पर इसे पूरा ना कर सके क्योंकि ढाका के क्रांतिकारी हेमचन्द्र घोष के संपर्क में आकर वो युगांतर पार्टी से जुड़े मुक्ति संघ में शामिलहो गए|
1928 में वो अपने कई साथियों के साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के समय नेता जी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा बनाये गए समूह बंगाल वालियंटर में शामिल हो गए | शीघ्र ही इस समूह ने स्वयं को एक सक्रिय विप्लवी संगठन में परिवर्तित कर लिया जिसका लक्ष्य था कुख्यात ब्रिटिश पुलिस अधिकारीयों का सफाया| 1930 में संगठन ने इन्स्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस लोमैन को मारने का निश्चय किया| मेडिकल स्कूल हास्पीटल में एक बीमार पुलिस अधिकारी को देखने आये लोमैन को बेनोय ने अपनी गोलियों का निशाना बना दिया जो तुरतं मर गया और पुलिस अधीक्षक हडसन गंभीर रूप से घायल हो गया| उनको पकड़ा नहीं जा सका पर कालेज से उनका फोटो लेकर उसे पूरे बंगाल में चिपका दिया गया| उनको पकड़ने के हालाँकि सभी प्रयास असफल रहे और कई बार पुलिस के हाथों आते आते वे बचे|
किसी रोमांचक फ़िल्मी पटकथा से कम नहीं है उनका पुलिस के हाथों से बचे रहना जिसमे वो मुस्लिम भिखारी से लेकर एक मालदार जमीदार तक सब कुछ बने| संगठन का अगला निशाना था, जेलों में भारतीय कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार करने वाले इन्स्पेक्टर जनरल ऑफ़ प्रिजन एन.एस. सिप्सन | निश्चय ना केवल उसकी हत्या का था बल्कि कलकत्ता के डलहौजी स्क्यूयर में स्थित सेकेट्रीएट बिल्डिंग राइटर्स बिल्डिंग पर हमला कर ब्रिटिश अधिकारियों के दिलों में भय उत्पन्न करने का भी था|
8 दिसंबर 1930 को यूरोपियन लिबास में बेनोय अपने साथियों दिनेश और बादल गुप्ता के साथ राइटर्स बिल्डिंग में प्रवेश कर गए और सिम्पसन को मार गिराया| फिर क्या था, ब्रिटिश पुलिस और तीन युवा क्रांतिकारियों में गोलीबारी शुरू हो गयी जिसमें कई अन्य अधिकारी भी गंभीर रूप से घायल हुए| लम्बे संघर्ष के बाद पुलिस उन पर हावी होने लगी| गिरफ्तार ना होने की इच्छा के चलते बादल गुप्ता ने पोटेशियम साइनाइड खा लिया जबकि विनय और दिनेश ने अपनी ही रिवाल्वार्स से खुद को गोली मार ली| दोनों को अस्पताल ले जाया गया जहाँ विनय की 13 दिसंबर 1930 को मृत्यु हो गयी पर दिनेश को बचा लिया गया| उन पर मुकदमा चला कर उन्हें मौत की सजा सुनाई गयी और 7 जुलाई 1931 को 19 वर्ष की आयु में उन्हें अलीपुर जेल में फांसी दे दी गयी|
इन तीनों की शहादत ने कितने ही दिलों को झझकोरा और क्रांति का ये कारवां आगे बढ़ता गया| स्वतंत्रता के बाद बेनोय और उनके साथियों दिनेश और बादल की स्मृति को अक्षुण रखने के लिए डलहौजी स्क्यूयर का नाम बदल कर इनके नाम पर कर दिया गया और आज इसे बी.बी.डी.(बेनोय-बादल-दिनेश) बाग़ कहा जाता है| ऐसे अमर बलिदानी बेनोय कृष्ण बसु को उनके जन्म दिवस पर कोटि कोटि नमन एवं भावपूर्ण श्रद्धांजलि|
~ लेखक : विशाल अग्रवाल
~ चित्र : माधुरी.
🙏 अमर शहीद बेनोय कृष्ण बसु को कोटि-कोटि नमन एवं भावपूर्ण श्रद्धांजलि।










