मैली चादर ओढ़ के कैसे,द्वार तुम्हारे आऊँ,

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मैली चादर ओढ़ के कैसे
द्वार तुम्हारे आऊँ,
हे पावन परमेश्वर !! मेरे
मन ही मन शरमाऊँ

तूने मुझको जग में भेजा
निर्मल देकर काया
आकर के सन्सार में मैंने
इसको दाग लगाया
जनम-जनम की मैली चादर
कैसे दाग छुड़ाऊँ
मैली चादर ओढ़ के कैसे

निर्मल-वाणी पाकर तुझसे (1)
नाम ना तेरा गाया (2)
आँखें मूँद कर हे परमेश्वर !! (3)
कभी न तुझको ध्याया
मन-वीणा की तारें टूटी
अब क्या गीत सुनाऊँ
मैली चादर ओढ़ के कैसे

इन पैरों से चल कर तेरे
मन्दिर कभी ना आया
जहाँ-जहाँ हो पूजा तेरी (4)
कभी न शीश झुकाया
हे हरी !!! अब मैं हार के आया (5)
अब क्या हार चढ़ाऊँ
मैली चादर ओढ़ के कैसे
द्वार तुम्हारे आऊँ,
हे पावन परमेश्वर !! मेरे
मन ही मन शरमाऊँ
मैली चादर ओढ़ के कैसे
मैली चादर ओढ़ के कैसे
मैली चादर ओढ़ के कैसे

निर्मल-वाणी पाकर तुझसे (1) :- *निर्मल-वाणी का अर्थ है “वेद” | चार-वेद ही निर्मल वाणी हैं और निर्दोष हैं क्यों कि वेद में परस्पर कोई विरोधाभासी वचन नहीं मिलता, कोई सृष्टिक्रम विरुद्ध वचन नहीं है अतः यही वाणी निर्मल है |

नाम न तेरा गाया (2) :- अर्थात् यजुर्वेद 40/15 में कहा है “ओ३म् क्रतो स्मर” अर्थात् ओ३म् का स्मरण-चिन्तन करना चाहिए | यजुर्वेद 2/13 में कहा है “ओ३म् प्रतिष्ठ” अर्थात् ओ३म् की स्थापना कीजिये | यजुर्वेद 40/17 में कहा है “ओ३म् खं ब्रह्म” अर्थात् ओ३म् आकाश के तुल्य व्यापक ब्रह्म=बड़ा बताया है | दूसरे अर्थ में वेद का गायन करना ही उत्तम है क्यों कि ऋग्वेद (1/37/4) में कहा है “देवत्तं ब्रह्म गायत” अर्थात् परमात्मा के दिए वेद का गायन करो | ऋग्वेद (1/164/26) में वेद को कामधेनु कहा है | यह एक ऐसी कामधेनु है जो दूध ही दूध देती है | यह दूध सब के लिए है, किसी वर्ग विशेष के लिए नहीं, सब मनुष्यों के लिए है, बिना किसी भेदभाव के सबको इसका पान करने मिलता है, बस शर्त यह है की वह उस दूध का पान करना चाहता हो | गाय का दूध जैसे सम्पूर्ण भोजन होता है वैसे ही वेद का ज्ञान भी सम्पूर्ण है, गुणकारी है |

आँखें मूँद कर हे परमेश्वर !! (3) :- आँखें मूँद कर हे परमेश्वर !! :- ईश्वर का ध्यान सदा आँखें बन्द कर ही होता है, उसके ध्यान के लिए साकार मूर्ति, प्रतिमा, विग्रह की आवश्यकता नहीं है, निराकार-निर्गुण-सगुण परमात्मा का ध्यान किसी भी स्थान पर बैठ कर सदैव आँख बन्द करके किया जा सकता है, आँखें खोल कर रखने से साकार का ध्यान नहीं लगता परन्तु चंचलता बढ़ती है, एकाग्रता कम होती है, अन्यथा संसार साकार ही है यदि साकार से ध्यान लगता तो सब ध्यान मग्न होते पर ऐसा है नहीं ।

जहाँ-जहाँ हो पूजा तेरा (4) :- ‘पूजा’ शब्द का अर्थ सत्कार है | ईश्वर की पूजा दो प्रकार से होती है (एक) सगुण उपासना (दो) निर्गुण उपासना | इन दोनों के परिचय के लिए महर्षि दयानन्द कृत सत्यार्थ प्रकाश ग्रन्थ का स्वाध्याय कीजिये | जहाँ-जहाँ इस प्रकार की पूजा की जाती हो उस उस गुरुकुल, आश्रम या विद्वान् योगी का सत्संग करना ही चाहिए | ऋग्वेद मन्त्र 5/29/13 “क॒थो नु ते॒ परि॑ चराणि”कैसे तेरी पूजा करूँ ? सेवा करूँ ? इस प्रश्न का उत्तर ऋग्वेद के ही अन्य मन्त्र 5/14/1 “अ॒ग्निं स्तोमे॑न बोधय समिधा॒नो अम॑र्त्यम् ।“ परमेश्वर की स्तुति प्रकाशमान होकर की जा सकती है , गुणों को जीवन में धारण करने में ही पूजा है |

हे हरी !!! मैं हार के आया (5) :-
अ) हरी अर्थात् दु:ख और अज्ञान को हरने वाले दो गुणों से युक्त रूप

हरी = हरी/हरि नाम शक्ति का है |
जैसा की “युक्ताह्यस्य हरयः शतादश” ऋग्वेद 6/47/18 में वर्णन किया गया है कि हरयः = अनन्त शक्ति सम्पन्न होने से वह परमात्मा सर्वशक्तिमान् है |
हरि नाम शक्ति का इस प्रकार है कि “हरति इति हरि:” जो प्रतिद्वन्दी बलों को हरण करे, या जो अविद्यादि क्लेशों का हरण करने वाला हो उसका नाम हरि है | इसी अभिप्राय से सूर्य की किरणों का नाम हरि है क्यों की वे भी अन्धकार का हरण करती हैं | निरुक्त में “हरी इन्द्रस्य, रोहितोऽग्ने:” निरुक्त 2/28 बतलाया है | इन्द्र = ईश्वर की शक्ति तथा अग्नि की ज्वाला का नाम हरि है क्यों की अग्नि की ज्वाला अन्धकार का हरण करती है | इसलिये हरि शब्द से साकार की सिद्धि करना सर्वथा निष्फल है क्यों हरी नाम शक्ति का है | श्रीमद् आर्यमुनि जी द्वारा ऋग्वेद-भाष्यम् , सप्तम मण्डलम्, द्वितीय भाग:, की प्रस्तावना में से उद्धृत, पृष्ठ 21 |