आओ मित्रो मिलकर गायें, गायें प्रभु के गीत ,जगाएँ स्वर लहरी में प्रीत

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आओ मित्रो मिलकर गायें
गायें प्रभु के गीत
जगाएँ स्वर लहरी में प्रीत

भक्ति भाव से परम देव को
निज श्रद्धा की भेंट चढ़ायें
शुचि पावक इस दिव्य नाद से
कोटि-कोटि मन-जीत
जगायें स्वर लहरी में प्रीत

भावभीनीं हैं वैदिक गीतियाँ
अर्चनीय और हैं वन्दारु
उसकी शरण में बैठ के गायें
अमर भक्ति-संगीत
जगाएँ स्वर लहरी में प्रीत

सबसे प्रवर महिष्ठ वो दानी
करता सुकृति वो अभिरामी
सद्गुण-सत्कर्मों का प्रकाशक
साधक होवें प्रदीप्त
जगायें स्वर लहरी में प्रीत

धर्म मिलेगा, सुधन भी मिलेगा
ज्योतिस्वरूप से तेज मिलेगा
सत्याचारी-सत्यज्ञानी प्रभु
करता है वेद-प्रणीत
जगाएँ स्वर लहरी में प्रीत

गगनचुम्बी महत्ता का अधिपति
‘शुक्रशोचि’ है उसकी ज्योति
मानस-पटल पर यदि पड़ जाए
मानस बने प्रदीप
जगाएँ स्वर लहरी में प्रीत

कालिमा-मलिनता नष्ट करें प्रभु
अन्तःकरण पवित्र बनाये
अग्रणी प्रभु के स्पर्श से पापी
बन जाए अवलीक
जगाएँ स्वर लहरी में प्रीत

सुभग-सुपथ के प्रवर प्रणेता
प्राणीमात्र के तुम्हीं प्रचेता
इन्द्र की गायें महिमा अनवरत
और बढ़ाएँ प्रीत
जगाएँ स्वर लहरी में प्रीत
आओ मित्रो मिलकर गायें
गायें प्रभु के गीत
जगाएँ स्वर लहरी में प्रीत