राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी:

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स्वतंत्रता संग्राम के अमर दीपस्तंभ 🇮🇳💐

17 दिसंबर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस अमर योद्धा का बलिदान दिवस है, जिसने देश के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए। वह महान क्रांतिकारी, अटूट इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प के प्रतीक अमर शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी थे। उनका जीवन त्याग, साहस और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण का अनुपम उदाहरण है। 🙏🔥


प्रारंभिक जीवन एवं क्रांतिकारी चेतना 👶⚡

राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का जन्म 23 जून 1901 को बंगाल (अब बांग्लादेश) के पबना जिले के मोहनपुर गाँव में हुआ था। उन्हें क्रांतिकारी विचारधारा विरासत में मिली थी क्योंकि जब वे जन्मे, तब उनके पिता क्षितीश मोहन लाहिड़ी और बड़े भाई अनुशीलन दल की गुप्त गतिविधियों में शामिल होने के कारण जेल में थे। 💪🔗

केवल 9 वर्ष की आयु में वे वाराणसी आ गए, जहाँ उनका पालन-पोषण हुआ। शिक्षा ग्रहण करने के दौरान वे सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल के संपर्क में आए, जिन्होंने उनकी प्रतिभा और देशभक्ति की भावना को पहचानकर उन्हें “बंग वाणी” पत्रिका के संपादन का कार्य सौंपा। साथ ही, उन्हें अनुशीलन दल की वाराणसी शाखा के सशस्त्र विभाग का प्रभार भी दिया गया। ✍️🔥


क्रांतिकारी गतिविधियाँ और काकोरी कांड 🏹💣

भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त करने के लिए धन की तत्काल आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य से पं. राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में शाहजहाँपुर में एक बैठक हुई, जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी भी शामिल हुए। इस बैठक में अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना को अंतिम रूप दिया गया, जिसे इतिहास में “काकोरी कांड” के नाम से जाना जाता है। 🚂💰

राजेन्द्रनाथ को बम बनाने का प्रशिक्षण लेने के लिए बंगाल भेजा गया, लेकिन वहाँ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पहले उन्हें 10 साल की सजा हुई, जिसे बाद में घटाकर 5 साल कर दिया गया। इसके बाद, उन्हें काकोरी कांड के मुख्य आरोपियों में शामिल कर लिया गया और मुकदमे के दौरान फांसी की सजा सुनाई गई। ⚖️🔗


बलिदान: फांसी से पहले के अंतिम शब्द 🏴‍☠️⚔️

राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को 17 दिसंबर 1927 को गोण्डा जेल में निर्धारित तिथि से दो दिन पूर्व ही फाँसी दे दी गई। यह कायर ब्रिटिश सरकार का एक कुटिल प्रयास था ताकि क्रांतिकारियों को अंतिम समय में कोई रणनीति बनाने का मौका न मिले। लेकिन देश के इस वीर सपूत ने मृत्यु से तनिक भी भय नहीं खाया। फांसी से पहले उन्होंने ऊँची आवाज़ में नारा लगाया—

“वंदे मातरम्! मैं मर नहीं रहा हूँ, बल्कि स्वतंत्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ!” 🇮🇳🔥

उनके साथ पं. राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और ठाकुर रोशन सिंह को भी फांसी की सजा दी गई। इन चारों बलिदानियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत की स्वतंत्रता की नींव को और मजबूत कर दिया। 🙌🏾🕊️


अमर शहीद को कोटि-कोटि नमन 🙏💐

राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि युवा शक्ति के प्रेरणास्रोत भी हैं। उन्होंने अपने साहस, त्याग और बलिदान से यह संदेश दिया कि राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए हर कठिनाई का सामना करना चाहिए और अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिए। उनका जीवन हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

💐 ऐसे वीर बलिदानी को हम कोटि-कोटि नमन करते हैं! 💐

🇮🇳 वंदे मातरम्! भारत माता की जय! 🇮🇳

17 दिसंबर देश की स्वतन्त्रता के लिये हँसते-हँसते अपने प्राण न्योछावर करने वाले प्रतिभावान क्रान्तिकारी, देशप्रेम, फौलादी इच्छाशक्ति और दृढ़ निश्चय के प्रतीक अमर शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का बलिदान दिवस है।

बंगाल (आज का बांग्लादेश) के पबना जिला अन्तर्गत मोहनपुर गाँव में 23 जून 1901 को जन्मे राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को देश-प्रेम और निर्भीकता की भावना विरासत में मिली थी। उनके जन्म के समय उनके पिता क्रान्तिकारी क्षितीश मोहन लाहिडी व बडे भाई बंगाल में चल रही अनुशीलन दल की गुप्त गतिविधियों में योगदान देने के आरोप में कारावास की सलाखों के पीछे कैद थे। दिल में राष्ट्र-प्रेम की चिन्गारी लेकर मात्र नौ वर्ष की आयु में ही वे बंगाल से अपने मामा के घर वाराणसी पहुँचे।

राजेन्द्रनाथ इस धार्मिक नगरी में पढाई करने गये थे किन्तु दैवयोग से वहाँ पहले से ही निवास कर रहे सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आ गये। राजेन्द्र की फौलादी दृढ़ता, देश-प्रेम और आजादी के प्रति दीवानगी के गुणों को पहचान कर शचीन दा ने उन्हें अपने साथ रखकर बनारस से निकलने वाली पत्रिका बंग वाणी के संपादन का दायित्व तो दिया ही, अनुशीलन दल की वाराणसी शाखा के सशस्त्र विभाग का प्रभार भी सौंप दिया। उनकी कार्य कुशलता को देखते हुए उन्हें हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन की गुप्त बैठकों में आमन्त्रित भी किया जाने लगा।

क्रान्तिकारियों द्वारा चलाये जा रहे स्वतन्त्रता-आन्दोलन को गति देने के लिये धन की तत्काल व्यवस्था को देखते हुए शाहजहाँपुर में दल के सामरिक विभाग के प्रमुख पण्डित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ के निवास पर हुई बैठक में राजेन्द्रनाथ लाहिडी भी सम्मिलित हुए जिसमें सभी क्रान्तिकारियों ने एकमत से अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना को अन्तिम रूप दिया था। इस योजना में लाहिडी का अहम् रोल था|

काकोरी काण्ड के बाद बिस्मिल ने उन्हें बम बनाने का प्रशिक्षण लेने बंगाल भेज दिया। यहाँ गिरफ्तारी के बाद उनपर मुकदमा दायर किया जिसमें पहले 10 वर्ष की सजा हुई जो बाद में अपील करने पर घटाकर 5 वर्ष कर दी गयी। यहाँ से उन्हें काकोरी काण्ड में शामिल करने के लिये लखनऊ लाया गया। तमाम अपीलों व दलीलों के बावजूद सरकार टस से मस न हुई और अन्तत: राजेन्द्रनाथ लाहिडी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल,अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह- एक साथ चार व्यक्तियों को फाँसी की सजा सुना दी गयी। लाहिड़ी को सम्राट के विरुद्ध युद्ध छेड़ने, सरकार का तख्ता पलटने और रेलवे खजाना लूटने के आरोप में 17 दिसंबर 1927 को गोण्डा जिला कारागार में निर्धारित तिथि से दो दिन पूर्व फाँसी पर लटकाकर मार दिया गया।

आजादी के इस दीवाने ने हँसते-हँसते फाँसी का फन्दा चूमने से पहले वंदे मातरम् की हुंकार भरते हुए कहा था- “मैं मर नहीं रहा हूँ,बल्कि स्वतन्त्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ।” इस अमर शहीद को कोटिशः नमन|