भारत के वीर सपूतों की गाथा में ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। ‘नौशेरा के शेर’ के नाम से प्रसिद्ध यह योद्धा मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने न केवल भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपराओं को निभाया, बल्कि अपने अद्वितीय साहस, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति से इतिहास में अमर हो गए।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का जन्म 15 जुलाई 1912 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के बीबीपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता खान बहादुर मोहम्मद फारुख एक पुलिस अधिकारी थे और बनारस के कोतवाल के रूप में कार्यरत थे। उनकी माता जमीरुन्निसां एक गृहिणी थीं। तीन बहनों के लाडले मोहम्मद उस्मान ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय मदरसे से प्राप्त की और बाद में हरिश्चंद्र हाई स्कूल, वाराणसी और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन किया।
बचपन से ही वह निडर और साहसी थे। महज 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने मित्र को बचाने के लिए कुएं में छलांग लगा दी थी। न केवल वे एक अच्छे खिलाड़ी थे, बल्कि वे प्रखर वक्ता भी थे। उनके पिता चाहते थे कि वे पुलिस की नौकरी करें, लेकिन उनका झुकाव सेना की ओर था।
भारतीय सेना में प्रवेश और योगदान
ब्रिटिश हुकूमत के समय भारतीयों को सेना में उच्च पदों पर जगह नहीं मिलती थी, लेकिन प्रतिभाशाली होने के कारण मोहम्मद उस्मान का चयन ब्रिटेन की ‘रॉयल मिलिट्री एकेडमी, सैंडहर्स्ट’ में हुआ। वह उन 10 भारतीय कैडेटों में शामिल थे, जिन्हें 1934 में ब्रिटेन में सैन्य प्रशिक्षण के लिए भेजा गया था। 19 मार्च 1935 को उन्हें ‘10 बलूच रेजिमेंट’ में कमीशन प्राप्त हुआ।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने मलेशिया, बर्मा और अफगानिस्तान में महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया। उनकी वीरता और नेतृत्व क्षमता के चलते वे जल्दी ही उच्च पदों पर पहुंच गए और ब्रिटिश सेना में ब्रिगेडियर बनने वाले गिने-चुने भारतीयों में से एक बन गए।
भारत-पाक विभाजन और मोहम्मद उस्मान का राष्ट्रप्रेम
1947 में जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ, तो मोहम्मद उस्मान की रेजिमेंट (10 बलूच) पाकिस्तान के हिस्से में चली गई। इस दौरान पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें पाकिस्तानी सेना का प्रमुख (चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ) बनाने का प्रस्ताव दिया। लेकिन राष्ट्रभक्त उस्मान ने इसे ठुकराते हुए कहा –
“जब तक जिंदगी है, मैं भारत की सेवा करता रहूंगा।”
इसके बाद उन्होंने भारतीय सेना में रहना स्वीकार किया और डोगरा रेजिमेंट में शामिल हो गए।
नौशेरा और झांगर का संघर्ष
पाकिस्तान ने अपनी स्थापना के तुरंत बाद ही कबायलियों और सैनिकों के माध्यम से जम्मू-कश्मीर में आक्रमण कर दिया। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को पैराशूट ब्रिगेड की कमान सौंपी गई और उन्हें नौशेरा व झांगर की सुरक्षा का जिम्मा दिया गया।
25 दिसंबर 1947 को पाकिस्तान की सेना ने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण झांगर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। इस पराजय से आहत ब्रिगेडियर उस्मान ने प्रण लिया कि जब तक झांगर को वापस नहीं लेंगे, तब तक चारपाई पर नहीं सोएंगे। अपने वचन का पालन करते हुए उन्होंने कठोर सर्दी के महीनों में भी चटाई पर ही विश्राम किया।
उनकी कुशल सैन्य रणनीति के तहत 50 पैरा ब्रिगेड ने 18 मार्च 1948 को झांगर को पुनः भारत के अधीन कर लिया। इस विजय के बाद लेफ्टिनेंट जनरल के.एम. करिअप्पा ने उन्हें “नौशेरा का शेर” कहा।
इस युद्ध में भारत के मात्र 36 सैनिक शहीद हुए, जबकि पाकिस्तान के 1,000 से अधिक सैनिक मारे गए। इस जीत से बौखलाए पाकिस्तान ने ब्रिगेडियर उस्मान के सिर के बदले 50,000 रुपये इनाम की घोषणा कर दी।
शहादत
3 जुलाई 1948 को पाकिस्तान ने झांगर क्षेत्र पर भारी गोलाबारी शुरू कर दी। शाम के समय जब ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान अपने टेंट से बाहर निकले, तभी एक गोला उनके पास आकर गिरा और उन्होंने वीरगति प्राप्त कर ली।
उनके अंतिम शब्द थे –
“हम तो जा रहे हैं, लेकिन यह सुनिश्चित करना कि हमारी धरती का एक इंच भी दुश्मन के हाथ में न जाए।”
अमर विरासत
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान स्वतंत्र भारत के पहले उच्च सैन्य अधिकारी थे, जो पाकिस्तान के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हुए। उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनके सम्मान में झांगर में ‘उस्मान मेमोरियल’ स्थापित किया गया, जहां हर वर्ष 3 जुलाई को विशेष प्रार्थना सभा आयोजित की जाती है। इस दिन को ‘झांगर दिवस’ के रूप में भी जाना जाता है।
उनकी अंतिम यात्रा में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन सहित अनेक गणमान्य लोग शामिल हुए थे। यह सम्मान आज तक किसी अन्य भारतीय सैनिक को नहीं मिला।
निष्कर्ष
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान न केवल एक वीर योद्धा थे, बल्कि एक सच्चे इंसान भी थे। उन्होंने शादी नहीं की और अपना अधिकतर वेतन गरीब बच्चों की शिक्षा और जरूरतमंदों की सहायता में खर्च किया।
उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्रसेवा किसी जाति, धर्म या समुदाय की जागीर नहीं होती। वे हर भारतीय के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। उनकी देशभक्ति, त्याग और वीरता सदैव हमारे हृदयों में अमर रहेगी।
भारत माता के इस अमर सपूत को कोटिशः नमन
नौशेरा के शेर: ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान
भारत के वीर सपूतों की गाथा में ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। ‘नौशेरा के शेर’ के नाम से प्रसिद्ध यह योद्धा मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने न केवल भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपराओं को निभाया, बल्कि अपने अद्वितीय साहस, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति से इतिहास में अमर हो गए।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का जन्म 15 जुलाई 1912 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के बीबीपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता खान बहादुर मोहम्मद फारुख एक पुलिस अधिकारी थे और बनारस के कोतवाल के रूप में कार्यरत थे। उनकी माता जमीरुन्निसां एक गृहिणी थीं। तीन बहनों के लाडले मोहम्मद उस्मान ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय मदरसे से प्राप्त की और बाद में हरिश्चंद्र हाई स्कूल, वाराणसी और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन किया।
बचपन से ही वह निडर और साहसी थे। महज 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने मित्र को बचाने के लिए कुएं में छलांग लगा दी थी। न केवल वे एक अच्छे खिलाड़ी थे, बल्कि वे प्रखर वक्ता भी थे। उनके पिता चाहते थे कि वे पुलिस की नौकरी करें, लेकिन उनका झुकाव सेना की ओर था।
भारतीय सेना में प्रवेश और योगदान
ब्रिटिश हुकूमत के समय भारतीयों को सेना में उच्च पदों पर जगह नहीं मिलती थी, लेकिन प्रतिभाशाली होने के कारण मोहम्मद उस्मान का चयन ब्रिटेन की ‘रॉयल मिलिट्री एकेडमी, सैंडहर्स्ट’ में हुआ। वह उन 10 भारतीय कैडेटों में शामिल थे, जिन्हें 1934 में ब्रिटेन में सैन्य प्रशिक्षण के लिए भेजा गया था। 19 मार्च 1935 को उन्हें ‘10 बलूच रेजिमेंट’ में कमीशन प्राप्त हुआ।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने मलेशिया, बर्मा और अफगानिस्तान में महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया। उनकी वीरता और नेतृत्व क्षमता के चलते वे जल्दी ही उच्च पदों पर पहुंच गए और ब्रिटिश सेना में ब्रिगेडियर बनने वाले गिने-चुने भारतीयों में से एक बन गए।
भारत-पाक विभाजन और मोहम्मद उस्मान का राष्ट्रप्रेम
1947 में जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ, तो मोहम्मद उस्मान की रेजिमेंट (10 बलूच) पाकिस्तान के हिस्से में चली गई। इस दौरान पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें पाकिस्तानी सेना का प्रमुख (चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ) बनाने का प्रस्ताव दिया। लेकिन राष्ट्रभक्त उस्मान ने इसे ठुकराते हुए कहा –
“जब तक जिंदगी है, मैं भारत की सेवा करता रहूंगा।”
इसके बाद उन्होंने भारतीय सेना में रहना स्वीकार किया और डोगरा रेजिमेंट में शामिल हो गए।
नौशेरा और झांगर का संघर्ष
पाकिस्तान ने अपनी स्थापना के तुरंत बाद ही कबायलियों और सैनिकों के माध्यम से जम्मू-कश्मीर में आक्रमण कर दिया। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को पैराशूट ब्रिगेड की कमान सौंपी गई और उन्हें नौशेरा व झांगर की सुरक्षा का जिम्मा दिया गया।
25 दिसंबर 1947 को पाकिस्तान की सेना ने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण झांगर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। इस पराजय से आहत ब्रिगेडियर उस्मान ने प्रण लिया कि जब तक झांगर को वापस नहीं लेंगे, तब तक चारपाई पर नहीं सोएंगे। अपने वचन का पालन करते हुए उन्होंने कठोर सर्दी के महीनों में भी चटाई पर ही विश्राम किया।
उनकी कुशल सैन्य रणनीति के तहत 50 पैरा ब्रिगेड ने 18 मार्च 1948 को झांगर को पुनः भारत के अधीन कर लिया। इस विजय के बाद लेफ्टिनेंट जनरल के.एम. करिअप्पा ने उन्हें “नौशेरा का शेर” कहा।
इस युद्ध में भारत के मात्र 36 सैनिक शहीद हुए, जबकि पाकिस्तान के 1,000 से अधिक सैनिक मारे गए। इस जीत से बौखलाए पाकिस्तान ने ब्रिगेडियर उस्मान के सिर के बदले 50,000 रुपये इनाम की घोषणा कर दी।
शहादत
3 जुलाई 1948 को पाकिस्तान ने झांगर क्षेत्र पर भारी गोलाबारी शुरू कर दी। शाम के समय जब ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान अपने टेंट से बाहर निकले, तभी एक गोला उनके पास आकर गिरा और उन्होंने वीरगति प्राप्त कर ली।
उनके अंतिम शब्द थे –
“हम तो जा रहे हैं, लेकिन यह सुनिश्चित करना कि हमारी धरती का एक इंच भी दुश्मन के हाथ में न जाए।”
अमर विरासत
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान स्वतंत्र भारत के पहले उच्च सैन्य अधिकारी थे, जो पाकिस्तान के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हुए। उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनके सम्मान में झांगर में ‘उस्मान मेमोरियल’ स्थापित किया गया, जहां हर वर्ष 3 जुलाई को विशेष प्रार्थना सभा आयोजित की जाती है। इस दिन को ‘झांगर दिवस’ के रूप में भी जाना जाता है।
उनकी अंतिम यात्रा में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन सहित अनेक गणमान्य लोग शामिल हुए थे। यह सम्मान आज तक किसी अन्य भारतीय सैनिक को नहीं मिला।
निष्कर्ष
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान न केवल एक वीर योद्धा थे, बल्कि एक सच्चे इंसान भी थे। उन्होंने शादी नहीं की और अपना अधिकतर वेतन गरीब बच्चों की शिक्षा और जरूरतमंदों की सहायता में खर्च किया।
उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्रसेवा किसी जाति, धर्म या समुदाय की जागीर नहीं होती। वे हर भारतीय के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। उनकी देशभक्ति, त्याग और वीरता सदैव हमारे हृदयों में अमर रहेगी।
भारत माता के इस अमर सपूत को कोटिशः नमन










