देशभक्त जिन्हें आजादी के बाद मिली गुमनाम जिंदगी
स्वतंत्रता संग्राम के वीर सेनानी बटुकेश्वर दत्त का जीवन भारत की आजादी के बाद भी संघर्षों से भरा रहा। उन्हें वह सम्मान और पहचान नहीं मिली जिसके वे वास्तव में हकदार थे।
क्रांतिकारी जीवन और संघर्ष
बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवंबर 1910 को बंगाल के बर्दवान जिले में हुआ था। वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के सदस्य थे और भगत सिंह के साथ दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने की ऐतिहासिक घटना में शामिल थे। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को यह दिखाने के लिए बम फेंका था कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी आंदोलन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इस घटना के बाद उन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई और उन्होंने करीब 15 साल जेल में बिताए।
आजादी के बाद संघर्ष
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, बटुकेश्वर दत्त को उम्मीद थी कि नया भारत उनके बलिदानों को याद रखेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जेल से रिहा होने के बाद उन्हें कोई सम्मानजनक नौकरी नहीं मिली और वे पटना में एक सिगरेट कंपनी के एजेंट के रूप में काम करने को मजबूर हो गए। उन्होंने बिस्कुट और ब्रेड का छोटा सा व्यवसाय भी शुरू किया, लेकिन उसमें भी घाटा हुआ। इसके बाद वे टूरिस्ट एजेंसी और बस परिवहन का कार्य करने लगे, परंतु इसमें भी सफलता नहीं मिली।
बीमारी और उपेक्षा
1964 में जब वे गंभीर रूप से बीमार हुए, तो उन्हें पटना के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनकी दयनीय हालत पर क्रांतिकारी चमनलाल आजाद ने एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने सरकार की बेरुखी पर सवाल उठाए। इसके बाद मामला चर्चा में आया, और पंजाब सरकार ने मदद की पेशकश की। लेकिन बिहार सरकार की उपेक्षा के चलते उन्हें सही इलाज नहीं मिला। अंततः उन्हें दिल्ली लाया गया और सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया।
अंतिम दिन और आखिरी इच्छा
दिल्ली पहुंचकर उन्होंने कहा था, “मुझे सपने में भी ख्याल न था कि जिस दिल्ली में मैंने बम फेंका था, वहां एक अपाहिज की तरह स्ट्रेचर पर लाया जाऊंगा।” एम्स में इलाज के दौरान पता चला कि उन्हें कैंसर हो गया है। पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशन जब उनसे मिलने आए और कुछ मांगने को कहा, तो उन्होंने सिर्फ एक ही इच्छा जताई—
“मेरा अंतिम संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के पास किया जाए।”

17 जुलाई 1965 को वे कोमा में चले गए और 20 जुलाई की रात 1:50 बजे उनका निधन हो गया। उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए उनका अंतिम संस्कार हुसैनीवाला (भारत-पाक सीमा) में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की समाधि के पास किया गया।
निष्कर्ष
बटुकेश्वर दत्त ने अपना पूरा जीवन देश के लिए समर्पित कर दिया, लेकिन स्वतंत्र भारत में उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि देश के सच्चे नायकों को केवल स्मारकों में नहीं, बल्कि हृदय में बसाने की जरूरत है।
विस्तृत जीवन परिचय

देशभक्त बटुकेश्वर दत्त: जिन्हें आजादी के बाद मिली गुमनाम जिंदगी
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देश की आजादी के लिए तमाम पीड़ा झेलने वाले क्रांतिकारी एवं स्वतंत्रता सेनानी बटुकेश्वर दत्त का जीवन भारत की स्वतंत्रता के बाद भी दंश, पीड़ाओं, और संघर्षों की गाथा बना रहा और उन्हें वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वह हकदार थे।
आजादी की खातिर 15 साल जेल की सलाखों के पीछे गुजारने वाले बटुकेश्वर दत्त को आजाद भारत में रोजगार मिला एक सिगरेट कंपनी में एजेंट का, जिससे वह पटना की सड़कों पर खाक छानने को विवश हो गये।
बाद में उन्होंने बिस्कुट और डबलरोटी का एक छोटा सा कारखाना खोला, लेकिन उसमें काफी घाटा हो गया और जल्द ही बंद हो गया। कुछ समय तक टूरिस्ट एजेंट एवं बस परिवहन का काम भी किया, परंतु एक के बाद एक कामों में असफलता ही उनके हाथ लगी।
दत्त के जीवन के इन अज्ञात पहलुओं का खुलासा नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित किताब (बटुकेश्वर दत्त, भगत सिंह के सहयोगी) में हुआ है। अनिल वर्मा द्वारा लिखी गयी यह संभवत: पहली ऐसी किताब है, जो उनके जीवन का प्रामाणिक दस्तावेज होने के साथ-साथ स्वतंत्रता संघर्ष और आजादी के बाद जीवन संघर्ष को उजागर करती है।
बटुकेश्वर दत्त के 1964 में अचानक बीमार होने के बाद उन्हें गंभीर हालत में पटना के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस पर उनके मित्र चमनलाल आजाद ने एक लेख में लिखा, क्या दत्त जैसे कांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए, परमात्मा ने इतने महान शूरवीर को हमारे देश में जन्म देकर भारी भूल की है। खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की बाजी लगा दी और जो फांसी से बाल-बाल बच गया, वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एडियां रगड़ रहा है और उसे कोई पूछने वाला नहीं है।
इसके बाद सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया और आजाद, केंद्रीय गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा और पंजाब के मंत्री भीमलाल सच्चर से मिले। पंजाब सरकार ने एक हजार रुपए का चेक बिहार सरकार को भेजकर वहां के मुख्यमंत्री केबी सहाय को लिखा कि यदि वे उनका इलाज कराने में सक्षम नहीं हैं तो वह उनका दिल्ली या चंडीगढ़ में इलाज का व्यय वहन करने को तैयार हैं।
बिहार सरकार की उदासीनता और उपेक्षा के कारण क्रांतिकारी बैकुंठनाथ शुक्ला पटना के सरकारी अस्पताल में असमय ही दम तोड़ चुके थे। अत: बिहार सरकार हरकत में आयी और पटना मेडिकल कॉलेज में ड़ॉ मुखोपाध्याय ने दत्त का इलाज शुरू किया। मगर उनकी हालत बिगड़ती गयी, क्योंकि उन्हें सही इलाज नहीं मिल पाया था और 22 नवंबर 1964 को उन्हें दिल्ली लाया गया।
दिल्ली पहुंचने पर उन्होंने पत्रकारों से कहा था, मुझे स्वप्न में भी ख्याल न था कि मैं उस दिल्ली में जहां मैने बम डाला था, एक अपाहिज की तरह स्ट्रेचर पर लाया जाउंगा। उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती किया गया। पीठ में असहनीय दर्द के इलाज के लिए किए जाने वाले कोबाल्ट ट्रीटमेंट की व्यवस्था केवल एम्स में थी, लेकिन वहां भी कमरा मिलने में देरी हुई। 23 नवंबर को पहली दफा उन्हें कोबाल्ट ट्रीटमेंट दिया गया और 11 दिसंबर को उन्हें एम्स में भर्ती किया गया।
बाद में पता चला कि दत्त बाबू को कैंसर है और उनकी जिंदगी के चंद दिन ही शेष बचे हैं। भीषण वेदना झेल रहे दत्त चेहरे पर शिकन भी न आने देते थे।
पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशन जब दत्त से मिलने पहुंचे और उन्होंने पूछ लिया, हम आपको कुछ देना चाहते हैं, जो भी आपकी इच्छा हो मांग लीजिए। छलछलाई आंखों और फीकी मुस्कान के साथ उन्होंने कहा, हमें कुछ नहीं चाहिए। बस मेरी यही अंतिम इच्छा है कि मेरा दाह संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के बगल में किया जाए।
लाहौर षडयंत्र केस के किशोरीलाल अंतिम व्यक्ति थे जिन्हें उन्होंने पहचाना था। उनकी बिगड़ती हालत देखकर भगत सिंह की मां विद्यावती को पंजाब से कार से बुलाया गया। 17 जुलाई को वह कोमा में चले गये और 20 जुलाई 1965 की रात एक बजकर 50 मिनट पर दत्त बाबू इस दुनिया से विदा हो गये। उनका अंतिम संस्कार उनकी इच्छा के अनुसार, भारत-पाक सीमा के करीब हुसैनीवाला में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधि के निकट किया गया।










