“न सन्त्येव ते येषां सतामपि न विद्यन्ते मित्रोदासीनशत्रवः ।”
(जो सच्चे सज्जन होते हैं, उनके लिए न कोई मित्र, न उदासीन और न ही शत्रु होता है — वे सबके हितैषी होते हैं।)
जन्म एवं पृष्ठभूमि
हुतात्मा राधाकृष्ण जी का जन्म पौष शुक्ला तृतीया, संवत् 1953 (ई. सन् 1896) को निज़ामाबाद (हैदराबाद) के ईसा मियां बाजार मोहल्ले में हुआ था। आप राजस्थानी मारवाड़ी समाज के भूषण एवं श्री जीतमल जी के सुपुत्र थे। प्रारम्भ में आप वैष्णव परंपरा के अनुयायी थे, किंतु आत्मचिंतन और वैदिक ज्ञान की ओर झुकाव उन्हें एक क्रांतिकारी मोड़ की ओर ले गया।
आर्यसमाज में पदार्पण
सन् 1934 में राधाकृष्ण जी आर्यसमाज के सिद्धांतों से प्रभावित होकर पूर्णतः आर्य बन गए। वैदिक धर्म के प्रचार में उन्होंने तन-मन से जुट जाना आरम्भ कर दिया। निज़ामाबाद क्षेत्र में उन्होंने मौखिक प्रचार के माध्यम से वैदिक विचारधारा का प्रसार करना प्रारम्भ किया।
उनके प्रयत्नों से जब समाज में जागृति की लहर दिखाई दी, तो सन् 1935 में पं. नरेन्द्र जी (मंत्री, प्रतिनिधि सभा) के सहयोग से उन्होंने आर्यसमाज निज़ामाबाद की स्थापना की। यह संस्था शीघ्र ही जनचेतना का केन्द्र बन गई।
संघर्ष और प्रताड़ना
उनकी लोकप्रियता और आर्यधर्म के प्रचार से हैदराबाद राज्य के मतान्ध पुलिस अधिकारियों को आपत्ति होने लगी। एक मुहर्रम के अवसर पर झूठे अभियोग के अन्तर्गत उन्हें धारा 104 के अंतर्गत गिरफ़्तार किया गया और ₹2000 का मुचलका लेकर एक वर्ष के लिए छोड़ा गया।
किन्तु राधाकृष्ण जी ने कभी प्रचार-कार्य से मुँह नहीं मोड़ा। आर्य सत्याग्रह के दौरान उन्होंने धन संग्रह तथा संगठन के क्षेत्र में भी विशेष योगदान दिया। इससे तानाशाही प्रशासन और अधिक क्रोधित हो उठा।
धर्मवेदी पर बलिदान
2 अगस्त 1939 ई. को एक धर्मान्ध अरब द्वारा राधाकृष्ण जी की निर्मम हत्या कर दी गई। कहा जाता है कि इस हत्या में पुलिस अधिकारियों की संलिप्तता भी रही, परंतु इसके ठोस प्रमाण नहीं मिल सके।
श्रद्धांजलि
राधाकृष्ण जी ने अपने प्राण धर्म के प्रचार में अर्पित कर दिए। वे धर्मवीर थे, प्रचारक थे, और वैदिक नवजागरण के सेनानी थे। उनका जीवन साहस, धैर्य, और निष्ठा का प्रतीक है।
“ऐसे अमर शहीदों के बलिदान से ही धर्म जीवित रहता है।”
🌺 हम श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं हुतात्मा राधाकृष्ण जी को। 🌺










