मुझे नहीं कुछ है नाथ चिन्ता,
हे नाथ !! हे नाथ !! हे नाथ !!
मुझे नहीं कुछ है नाथ चिन्ता,
कि जब है मन्दिर ये मन तुम्हारा
तुम्हीं से पाया था कर रहा हूँ,
तुम्हीं को अर्पण भवन तुम्हारा
बनाना चाहो इसे बना लो,
उजाड़ना हो उजाड़ डालो
प्रभु तुम्हीं बागवाँ हो इसके,
है ज़िस्म सारा चमन तुम्हारा
कराल कलिकाल के ठगों ने,
इरादा कुछ और ही किया है
सम्भालना लुट न जाए भगवन्
अमूल्य यह प्रेम-धन तुम्हारा
विचार आँखों का है कि
घटने-न पाए, आँसूओं की धारा
भरे कलश द्वार पर मिले जब,
हृदय में हो आगमन तुम्हारा
तुम्हीं से पाया था कर रहा हूँ,
तुम्हीं को अर्पण भवन तुम्हारा
मुझे नहीं कुछ है नाथ चिन्ता,
कि जब है मन्दिर ये मन तुम्हारा
रचनाकार :- श्री बिन्दु जी

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