जो भी बन जाए जीवन में
सच्चा योगी
उसकी भक्ति भी ईश्वर की
सच्ची ही होगी
मन-बुद्धि भी जुड़ जाए
चिन्मय प्रभु से
परागति भी फिर उसकी
क्यों ना होगी !
अपने क्षुद्र मन को हम
विभु की ओर मोड़ें
आत्मज्ञान सत्यज्ञान
बुद्धि मन से जोड़ें
सत्य योगी सर्वप्रेरक
देव से हैं प्रेरित
सत्य से है प्रेरित
उसके शारीरिक मानसिक
कर्म है बोधि
जो भी बन जाए जीवन में
सच्चा योगी
उसकी भक्ति भी ईश्वर की
सच्ची होगी
एक महान् आत्मा में
विप्र कर रहे हवन
और पा रहे अभीष्ट
कर रहे हैं सोमसवन
हर जीवात्मा से जुड़े हैं
प्रभु से नाते
जुड़े हैं प्रभु से नाते
लाभ हानि तो
जीव के कर्मों से होती
मन-बुद्धि भी जुड़ जाए
चिन्मय प्रभु से
परागति भी फिर उसकी
क्यों ना होगी !
‘वयुनावित’ है अकेला
कर्म सब के जाने
अनगिनत जीवों का
न्याय वो ही थामे
ऐसे अद्भुत देव की
स्तुति करें हम मन से
स्तुति करें मन से
होंगे पूर्ण समर्पित तो
मुक्ति भी होगी
जो भी बन जाए जीवन में
सच्चा योगी
उसकी भक्ति भी ईश्वर की
सच्ची ही होगी
मन-बुद्धि भी जुड़ जाए
चिन्मय प्रभु से
परागति भी फिर उसकी
क्यों ना होगी !
क्यों ना होगी !
क्यों ना होगी !
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– * १३.३.२०२२ ११.२० रात्रि
राग :- भैरवी
गायन समय प्रातः काल, ताल दादरा ६ मात्रा
शीर्षक :- सच्ची योग-महिमा
शब्दार्थ :-
चिन्मय = ज्ञानमय परमेश्वर
परागति = मोक्ष, मुक्ति, निस्तार
क्षुद्र = अधम, नीच
विभु = सर्वव्यापक परमात्मा
बोधि = सर्वश्रेष्ठ ज्ञान वाला
विप्र = धार्मिक मेधावी व्यक्ति (संत योगी मुनि ऋषि आदि)
सोमसवन = अमृतरस का पान
अभीष्ट = मनचाहा
वयुनावित = सबके ज्ञान और कर्मों को जाननेवाला
प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇
सच्ची योग-महिमा
विप्र लोग उस महान मित्र के साथ अपना मन जोड़ते हैं। इसी का नाम योग है। यह योगी,ज्ञानी, महात्मा लोग केवल अपने मन को ही उस चिन्मय प्रभु के साथ नहीं जोड़ते अपितु बुद्धि को भी जोड़ते हैं।
अपने शुद्ध मन को, उसके विभु मन के साथ जोड़ने से, हमारा मन एकाग्र हो जाता है, रुक जाता है; और अपनी बुद्धि के उसमें जुड़ने से हमें उसके आत्मज्ञान में से हमारे लिए उपयोगी सत्यज्ञान भी मिलने लगता है। इस प्रकार योगी, सन्त पुरुष उस सर्वप्रेरक देव की प्रेरणा से प्रेरित होकर अपने सब कर्म किया करते हैं। उनके यह सब शारीरिक वा मानसिक कर्म फिर उस परम देव में आहुतिरूप होते हैं। प्रभु उन सब के उन होत्रों को स्वीकार करते जाते हैं। और प्रतिदान में उन्हें उनके अनुकूल अपने ज्ञान को प्रेरित करते हैं। इस प्रकार उस एक महान आत्मा में संसार के सब (विप्र सब साधु, महात्मा, योगी) हवन कर रहे हैं और अपना -अपना अभीष्ट पा रहे हैं। यह कितने आश्चर्य की बात है कि उस अकेले ही देवता ने अपने -आपको इन सब जीवात्माओं के साथ ठीक- ठीक न्याय युक्त सम्बन्ध से जोड़ रखा है और सम्बन्ध जोड़ने पर उस सम्बन्ध को परिपूर्णता के साथ निभा रहा है! वह कैसा ‘वयुनावित’ है कि अकेला ही इन सब प्राणियों के एक-एक ज्ञान व कर्म को अलग-अलग कैसे जान रहा है! ज़रा देखो कि ये ज्ञानी पुरुष ही नहीं, किन्तु ना जानते हुए अनिच्छा से तो संसार के प्राणी मात्र ही उस एक यज्ञ पुरुष के साथ जुड़े हुए हैं और वह अकेला ही उन सब अनगिनत जीवों के साथ ना जाने कैसे परिपूर्ण न्याय कर रहा है! ऐसे अद्भुत देव की, उस अकेले सर्व-प्रेरक देव की हम जितनी स्तुति करें वह थोड़ी है, हम जितनी स्तुति करें वह थोड़ी है।










