◼️धर्म शिक्षा◼️

0
1

✍🏻 लेखक – स्वामी दर्शनानन्द जी

प्रस्तुति – 🌺 ‘अवत्सार’

  • 🧐प्रश्न- धर्म किसे कहते हैं?🌺उत्तर- धर्म उन स्वाभाविक गुणों का नाम है जिनके होने से वस्तु की सत्ता स्थिर रहती है और जिनके न होने पर वस्तु की सत्ता स्थिर नहीं रह सकती।
  • 🧐प्रश्न– हमें दृष्टान्त देकर समझा दो।🌺उत्तर- गर्मी और तेज अग्नि के धर्म हैं। जहाँ अग्नि होगी वहाँ गर्मी और तेज अवश्य होंगे जहाँ गर्मी और तेज न रहेंगे, वहाँ अग्नि भी न रहेगी।
  • 🧐प्रश्न– और दृष्टान्त दो।🌺उत्तर- मनुष्य-जीवन के लिए शरीर के अङ्ग और प्राण आवश्यक हैं। यदि शरीर का कोई अङ्ग कट जाए तो मनुष्य के जीवन का नाश नहीं होगा, परन्तु प्राणों के न रहने पर मनुष्य कभी जीवित न रहेगा।
  • 🧐प्रश्न– क्या जीव का धर्म प्राण धारण करना है?🌺उत्तर- नहीं, जीव का धर्म ज्ञान और प्रयत्न है, अर्थात् ज्ञान के अनुसार कर्म करना।
  • 🧐प्रश्न– जीव को कर्म करने की आवश्यकता क्यों हुई?🌺उत्तर- जीव अल्पज्ञ है, अत: उसे दुःख प्राप्त होता है, उस दुःख को दूर करने के लिए जीव को कर्म करने की आवश्यकता है।
  • 🧐प्रश्न– दुःख का लक्षण क्या है?🌺उत्तर- आवश्यकता का होना और उसकी पूर्ति के साधनों का न होना दुःख है, या स्वतन्त्रता का न होना दु:ख है।
  • 🧐प्रश्न– दुःख का अर्थ तो तक़लीफ़ है?🌺उत्तर- दुःख और तकलीफ़ दो पर्यावाचक शब्द हैं। जो लक्षण दुःख का है वही तक़लीफ़ का है।
  • 🧐प्रश्न– दुःख के वास्ते कोई प्रमाण देकर समझाओ।🌺उत्तर- एक मनुष्य घर में बैठा है, उसे कोई कष्ट नहीं है, परन्तु उसे घर से निकलने से बलपूर्वक रोक दिया जाए तो यह बन्धन ही दुःख है। जब क्षुधा लगे और भोजन न मिले तो दुःख है; यदि भोजन मिल जावे तो कष्ट नहीं। इसी प्रकार बहुत-से उदाहरण मिल सकते हैं।
  • 🧐प्रश्न– जीव अल्पज्ञ क्यों है?🌺उत्तर- एकदेशी अर्थात् परिच्छिन्न होने से।
  • 🧐प्रश्न- जीव दुःख से किस प्रकार छूट सकता है?🌺उत्तर- परमेश्वर के जानने और उसकी आज्ञानुसार कार्य करने से।
  • 🧐प्रश्न- परमेश्वर एक है या अनेक।🌺उत्तर- ईश्वर एक है।
  • 🧐प्रश्न- ईश्वर कौन है?🌺उत्तर- जो इस जगत् को रचनेवाला, पालनेवाला और नाश करनेवाला है।
  • 🧐प्रश्न- ईश्वर के होने में क्या प्रमाण है?🌺उत्तर- जगत् की प्रत्येक वस्तु का नियमानुसार कार्य करना और प्रत्येक वस्तु में नियम होना और इन नियमों के परीक्षार्थ वेद-जैसे पूर्ण शास्त्र का होना।
  • 🧐प्रश्न- ईश्वर को जगत् के रचने की क्या आवश्यकता थी?🌺उत्तर- उसकी स्वाभाविक दया और न्याय का गुण ही जगत् बनाने का हेतु है।
  • 🧐प्रश्न- न्याय और दया तो किसी दूसरे पर होती है, क्या ईश्वर के अतिरिक्त और वस्तु भी जगत् से पहले थी जिसपर न्याय और दया करने के लिए जगत् बनाया?🌺उत्तर- प्रकृति और जीव दो अनादि पदार्थ ईश्वर के अतिरिक्त हैं, अर्थात् ईश्वर, प्रकृति, और जीव तीन वस्तुएँ अनादि हैं। जीवों पर दया और न्याय के लिए ईश्वर जगत् को रचता अर्थात् उत्पन्न करता है।
  • 🧐प्रश्न- क्या जगत् से जीव और प्रकृति पृथक् हैं?🌺उत्तर- जीव और प्रकृति अनादि हैं और जगत् उत्पन्न किया हुआ है।
  • 🧐प्रश्न- यदि जीव और प्रकृति परमेश्वर के उत्पन्न किये हुए नहीं हैं तो इन्हें परमेश्वर का आज्ञाकारी किसने बनाया?🌺उत्तर- परमेश्वर अपने सर्वोत्तम गुण आनन्द और सर्वज्ञता आदि के कारण से इनपर अनादि काल से राज्य करता है।
  • 🧐प्रश्न- जो लोग परमेश्वर को प्रकृति और जीव आदि का रचनेवाला कहते हैं, क्या उनका विचार असत्य है?🌺उत्तर- उत्पन्न करने का अर्थ प्रकट करना है, अभाव से भाव में लाना नहीं, क्योंकि बिना शरीर में आये जीव का और बिना कार्य-जगत् बने प्रकृति का ज्ञान नहीं हो सकता, इसलिए जो शरीर और जगत् का रचनेवाला है वही उत्पन्न करनेवाला है।
  • 🧐प्रश्न- ईश्वर कहाँ है?🌺उत्तर- ‘कहाँ’ शब्द एकदेशी वस्तु के लिए आता है, क्योंकि ईश्वर सर्वव्यापक है, इसलिए ‘ईश्वर कहाँ है’ यह प्रश्न ही ठीक नहीं है। जैसे कोई कहे कि दूध में सफेदी कहाँ है तो कहेंगे कि दूध की बूंद-बूंद में। कोई कहे कि मिश्री में मिठास कहाँ है तो उत्तर होगा कि कण-कण में। इसी प्रकार जो वस्तु प्रत्येक स्थान में रहती हो उसके लिए ‘कहाँ’ के प्रश्न का उत्तर ‘प्रत्येक स्थान में’, ‘जगह-जगह पर’ होगा, कारण यह है कि कहाँ कहने का अर्थ कोई एक स्थान ज्ञात करना है, अतः यह प्रश्न ही ठीक नहीं है।
  • 🧐प्रश्न- यदि ईश्वर प्रत्येक स्थान में है तो हमें दिखाई क्यों नहीं देता, जबकि दूध में सफेदी हम नेत्र से देखते हैं, मिश्री में मिठास हम जिह्वा से ज्ञात करते हैं?🌺उत्तर- वर्तमान वस्तु के दृष्टि में न आने के छह कारण होते हैं- प्रथम, वस्तु हमारे नेत्र से बहुत समीप हो, जैसे सुरमा नेत्र से बहुत निकट होने के कारण दृष्टि में नहीं आता। दूसरे, दूर होने से दृष्टिगोचर नहीं होता। तीसरे, अत्यधिक सूक्ष्म होने से जैसे परमाणु विद्यमान होने पर भी दृष्टि में नहीं आते। चौथे, बहुत बड़ा होने से, जैसे हिमालय। पाँचवें, इन्द्रिय अर्थात् चक्षु आदि में विकार आ जाने से, जैसे अन्धे को दूध में सफेदी दृष्टिगोचर नहीं होती। छठे, आवरण (परदा, दीवार) होने पर हम दीवार के दूसरी ओर की वस्तुओं को नहीं देख सकते।
  • 🧐प्रश्न- इन छह कारणों में से हमारे ईश्वर के न जानने का क्या कारण है?🌺उत्तर- क्योंकि ईश्वर सर्वव्यापक है इस कारण जीव के अन्दर-बाहर होने से बहुत समीप है और दूसरे बहुत ही सूक्ष्म है, ये ही दो कारण हैं जिससे हमें ईश्वर दृष्टिगोचर नहीं होता।
  • 🧐प्रश्न- जो बहुत निकट हो उसके दृष्टिगोचर न होने का क्या कारण है?🌺उत्तर- क्योंकि मनुष्य को प्रत्येक वस्तु के देखने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है, इसलिए जब तक नेत्र और वस्तु के मध्य में प्रकाश की किरणें न हों, तब तक नेत्र से उस वस्तु का सम्बन्ध नहीं होता। सुरमे के नेत्र के अति समीप होने के कारण नेत्र और सुरमे के मध्य प्रकाश की किरणें नहीं हैं, अतः उसका ज्ञान नहीं होता।
  • 🧐प्रश्न- तो क्या ईश्वर को किसी प्रकार जान भी सकते हैं?🌺उत्तर- हम ईश्वर को अवश्य जान सकते हैं।
  • 🧐प्रश्न- किस प्रकार जान सकते हैं?🌺उत्तर- जिस प्रकार से नेत्र के सुरमे को जान सकते हैं, उसी प्रकार परमेश्वर को जान सकते हैं।
  • 🧐प्रश्न- नेत्र के सुरमे को देखने के लिए तो केवल एक शीशे की आवश्यकता है। शीशा हाथ में लिया और नेत्र का सुरमा दृष्टि में आया!🌺उत्तर- जैसे नेत्र के सुरमे को देखने के लिए बाह्य शीशे की आवश्यकता है, वैसे ही ईश्वर को देखने के लिए भी एक आन्तरीय शीशा है।
  • 🧐प्रश्न- वह आन्तरीय शीशा कौन-सा है?🌺उत्तर- मन। मनुष्य का दिल एक शीशा है जिसमें परमेश्वर का दर्शन किया जा सकता।
  • 🧐प्रश्न- मन तो प्रत्येक मनुष्य के पास है, फिर प्रत्येक मनुष्य को ईश्वर दृष्टिगोचर क्यों नहीं होता? मन क्या वस्तु है?🌺उत्तर- मन वह भीतरी सूक्ष्म वस्तु है जिसके कारण हमें एक समय में दो वस्तुओं का ज्ञान नहीं होता।
  • 🧐प्रश्न- मन प्रकृति से बना है या अप्राकृत है? वह नित्य है या अनित्य?🌺उत्तर- मन प्रकृति से बना है, उत्पत्तिवाला है, नित्य नहीं है।
  • 🧐प्रश्न- मन तो प्रत्येक मनुष्य के पास है, फिर सभी को ईश्वर दृष्टिगोचर क्यों नहीं होता?🌺उत्तर- यदि शीशे और नेत्र के मध्य में प्रकाश न हो तो शीशे की उपस्थिति में भी नेत्र का सुरमा दिखाई नहीं देता।
  • 🧐प्रश्न- मन और ईश्वर के मध्य कौन-सा अँधेरा है, जिसके कारण ईश्वर दृष्टिगोचर नहीं होता?🌺उत्तर- अविद्या का अँधेरा जब तक विद्या के प्रकाश से दूर न हो, तब तक ईश्वर दृष्टिगोचर नहीं हो सकता।
  • 🧐प्रश्न- अविद्या को दूर करने का उपाय क्या है?🌺उत्तर-सत्य विद्या।
  • 🧐प्रश्न- क्या कोई असत्य विद्या भी है?🌺उत्तर- विद्या शब्द ज्ञान का दूसरा नाम है और ज्ञान दो प्रकार का होता है, एक-उत्पत्तिवाले पदार्थों का जानना; दूसरे-नित्य पदार्थों का जानना। जो उत्पत्तिवाले पदार्थ हैं वे सब विकारी हैं, इसलिए उनका जानना भी परिणामी है, उसी को असत्य विद्या कहते हैं। सत्य कहते हैं नित्य को, अर्थात् जो तीन काल में रहे। परिणामी की सत्ता स्थिर नहीं रह सकती इसलिए वह अनित्य है।
  • 🧐प्रश्न- ज्ञान कितने प्रकार का होता है?🌺उत्तर- ज्ञान तीन प्रकार का है-विद्या, अविद्या, सत्यविद्या।
  • 🧐प्रश्न- अविद्या किसे कहते हैं?🌺उत्तर- पदार्थ के यथार्थ तत्त्व न को जानकर उलटा समझने को अविद्या कहते हैं।
  • 🧐प्रश्न- अविद्या गुण है या द्रव्य?🌺उत्तर-अविद्या गुण है।
  • 🧐प्रश्न- अविद्या जीव का स्वाभाविक गुण है या नैमित्तिक?🌺उत्तर- अविद्या नैमित्तिक है, स्वाभाविक नहीं।
  • 🧐प्रश्न- यदि अविद्या नैमित्तिक गुण है तो उसकी उत्पत्ति का कारण क्या है?🌺उत्तर- इन्द्रियों की कमजोरी और संस्कारों का दोष अविद्या की उत्पत्ति का कारण है।
  • 🧐प्रश्न- अविद्या से किस प्रकार का ज्ञान होता है?🌺उत्तर- चेतन अर्थात् ज्ञानवाले जीवात्मा को अचेतन प्रकृति का कार्य जानना, नित्य अर्थात् अनादि वस्तुओं को उत्पत्तिवाली और उत्पत्तिवाली वस्तुओं को अनादि समझना, शरीर आदि अपवित्र पदार्थों को पवित्र और दुःख देनेवाले पदार्थों को सुख का कारण और दुःख को सुख समझना-इस प्रकार का ज्ञान अविद्या कहलाता है।
  • 🧐प्रश्न- विद्या किसे कहते हैं?🌺उत्तर- चेतन जीवात्मा के ज्ञान का नाम विद्या है। जो अविद्या के गुण से पृथक हो और जिससे जितने परिणाम होते जावें उसी प्रकार से शुद्ध परिणामी ज्ञान हो, उसे विद्या कहते हैं।
  • 🧐प्रश्न- सत्यविद्या किसे कहते हैं?🌺उत्तर- जो सर्वज्ञ ईश्वर का अपरिणामी ज्ञान है, जो देश-काल और वस्तु के भेद से बदलता नहीं, उसे सत्यविद्या कहते हैं।
  • 🧐प्रश्न- सत्यविद्या और विद्या का भेद किसी दृष्टान्त से समझाओ!🌺उत्तर- जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश मनुष्यों के लिए संसार के आदि में ईश्वर ने उत्पन्न किया है, वह प्रत्येक मनुष्य के लिए एक-सा है, लेकिन मानवी सृष्टि का प्रकाश दीपक, लैम्प, गैस, बिजली, आदि अनेक भाँति का है, वह प्रत्येक गृह के लिए पृथक्-पृथक् प्रकार का है।
  • 🧐प्रश्न- क्या ईश्वरीय ज्ञान के बिना मनुष्य अपने जीवनोद्देश्य पर नहीं पहुँच सकता?🌺उत्तर- कदापि नहीं! जिस प्रकार प्रकाश के बिना नेत्र अपने काम को पूरा नहीं कर सकते, ऐसे ही बुद्धि भी बिना ईश्वरीय ज्ञान की सहायता के अपना काम नहीं कर सकती।
  • 🧐प्रश्न- नेत्र को काम करने के लिए प्रकाश की आवश्यकता है चाहे वह सूर्य का हो या लैम्प का, इसी प्रकार बुद्धि को विद्या चाहिए चाहे वह मनुष्य की बनाई हो या ईश्वर की।🌺उत्तर- मनुष्य के जीवनोद्देश्य बहुत कठिन और जीवन का समय बहुत न्यून है, इसलिए मनुष्य ईश्वरीय ज्ञान से ही कृतकार्य हो सकता है, उदाहरण के रूप में कोई मनुष्य दीपक को हाथ में लेकर नहीं चल सकता।
  • 🧐प्रश्न- क्या कारण है कि मनुष्य सूर्य के प्रकाश में दौड़कर चल सकता है और दीपक का प्रकाश लेकर दौड़कर नहीं चल सकता?🌺उत्तर- दीपक का प्रकाश पवन को सहन नहीं कर सकता, ऐसे ही मनुष्य की विद्या तर्क को सहन नहीं कर सकती। दीपक के बुझने का भय चलनेवाले को रोकता है और दूर तक देखने की शक्ति का न होना भी रोकनेवाला है। इसी प्रकार मनुष्य की विद्या केवल मान ली जाती है जिसे कोई “ईमान’ कहते हैं, और जिस मार्ग पर विद्या की सहायता से चले उसे “मत” कहते हैं, परन्तु मत और ईमान से कोई जीवनोद्देश्य पर नहीं पहुँच सकता, केवल धर्म और ज्ञान से पहुँच सकता है।
  • 🧐प्रश्न- मत और धर्म तो पर्यायवाचक शब्द हैं?🌺उत्तर- कदापि नहीं! मत के अर्थ मार्ग और धर्म का अर्थ स्वाभाविक गुण है।
  • 🧐प्रश्न- धर्म और मत की पहचान क्या है?🌺उत्तर- धर्म में जीवात्मा का सम्बन्ध सिवाय सर्वव्यापक परमेश्वर और अपने आत्मिक गुण के अन्य किसी प्राकृतिक वस्तु और मनुष्य-से नहीं होता, परन्तु मत बिना मनुष्य और प्राकृतिक सम्बन्ध के नहीं चल सकता।
  • 🧐प्रश्न- हमें धर्म और मत का दृष्टान्त देकर समझाओ!🌺उत्तर- धर्म के दस लक्षण जो मनु ने लिखे हैं उनको पढ़ो और मुस्लिम तथा ईसाइयों की पुस्तकों को पढ़ो तो धर्म और मत का भेद ज्ञात हो जाएगा।
  • 🧐प्रश्न- मनु ने धर्म के दस लक्षण कौन-से लिखे हैं?🌺उत्तर- प्रथम धृति, दूसरे क्षमा अर्थात् सहन करने की शक्ति, तीसरे मन को स्थिर रखना, चौथे चोरी का स्मरण तक न होने देना, पाँचवें शुद्ध अर्थात् पवित्र रहना, छठे अपनी इन्द्रियों को वश में रखना, सातवें बुद्धि को बढ़ाना, आठवें विद्या का ग्रहण करना, नवें सत्य के ग्रहण करने और असत्य के त्यागने में सर्वदा उद्यत रहना, दसवें क्रोध न करना।
  • ✍🏻 लेखक – स्वामी दर्शनानन्द जी
  • प्रस्तुति – 🌺 ‘अवत्सार’॥ओ३म्॥

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here