आँख दी इन्सान को

🙏 आज का वैदिक भजन 🙏


आँख दी इन्सान को –
ठोकर बचाने के लिए
दी जुबां इसको –
वेद के गीत गाने के लिए
दिल दिया है बेकसों पर
रहम खाने के लिए
हाथ भी दिये हैं –
देने दिलाने के लिए
“केवल” दिया सब कुछ हमें –
मानव कहाने के लिए

न यश-कीर्ति, सम्पदा चाहता हूँ
तेरा प्यार ही, हे पिता !! चाहता हूँ

वो नादान हैं जो, तेरी मूरत बना के
रचा ढ़ोङ्ग मन्दिर में, रखते सजा के
मैं तो मन के मन्दिर में, अपने बसा के
तुम्हें रात-दिन, पूजना चाहता हूँ
तेरा प्यार ही, हे पिता !! चाहता हूँ
न यश-कीर्ति, सम्पदा चाहता हूँ
तेरा प्यार ही, हे पिता !! चाहता हूँ

पदों डिग्रियों की, नहीं चाह कोई
जमाना हो दुश्मन, न परवाह कोई
मुझे कर सके ना, निरुत्साह कोई
यही हे दयालु , दया चाहता हूँ
तेरा प्यार ही, हे पिता !! चाहता हूँ
न यश-कीर्ति, सम्पदा चाहता हूँ
तेरा प्यार ही, हे पिता !! चाहता हूँ

प्रलोभन मुझे कोई, कितने दिखाये
मुझे मेरे पथ से, डिगा नहीं पाये
करूँ पार दुर्गम से, दुर्गम भी राहें
यही हे पिता !!, साधना चाहता हूँ
तेरा प्यार ही, हे पिता !! चाहता हूँ
न यश-कीर्ति, सम्पदा चाहता हूँ
तेरा प्यार ही, हे पिता !! चाहता हूँ

रहूँ दुष्ट अन्यायियों, का ना मैं साथी
बनूँ दीन दुखियों, जनों का हिमाती
“कवि वीर” दुनिया, फिरे जिसको गाती
मैं वो रसभरी – कविता चाहता हूँ
तेरा प्यार ही, हे पिता !! चाहता हूँ
न यश-कीर्ति, सम्पदा चाहता हूँ
तेरा प्यार ही, हे पिता !! चाहता हूँ

रचनाकार :- श्री (1) केवल जी (2) कवि वीर जी
स्वर :- पण्डित श्री योगेश दत्त जी आर्य